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जून, 2023 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

वंश आधारित समाज : वैदिक काल में वंश पर आधारित समाज बने, जैसे पूर्व में 3 ही वंशों का प्रचलन हुआ। 1. सूर्य वंश, 2. चंद्र वंश और 3. ऋषि वंश। उक्त तीनों वंशों के ही अनेक उप वंश होते गए। यदु वंश, सोम वंश और नाग वंश तीनों चंद्र वंश के अंतर्गत माने जाते हैं। अग्नि वंश और इक्ष्वाकु वंश सूर्य वंश के अंतर्गत हैं। सूर्य वंशी प्रतापी राजा इक्ष्वाकु से इक्ष्वाकु वंश चला। इसी इक्ष्वाकु कुल में राजा रघु हुए जिसने रघु वंश चला। भगवान राम जहां सूर्य वंश से थे, वहीं भगवान श्रीकृष्ण चंद्र वंश से थे। ऋषि वशिष्ठ ने भी एक अग्नि वंश चलाया था। ऋषि वंश: इसी प्रकार मरीचि, अत्रि, अंगिरा, पुलस्त्य, पुलह, कृतु, भृगु, वशिष्ठ, दक्ष, कर्दम, विश्वामित्र, पराशर, गौतम, कश्यप, भारद्वाज, जमदग्नि, अगस्त्य, गर्ग, विश्वकर्मा, शांडिल्य, रौक्षायण, कपि, वाल्मीकि, दधीचि, कवास इलूसू, वत्स, काकसिवत, वेद व्यास आदि ऋषियों के वंश चले, जो आगे चलकर भिन्न-भिन्न उपजातियों में विभक्त होते गए। आचार्य महाब्राह्मण जाति की उत्पत्ति के अनेक सिद्धान्त समय-समय पर इतिहासकारों द्वारा प्रतिपादित किये हैं. परन्तु कोई भी एक अकेला सिद्धांत इस जाति की उत्पत्ति को पूर्ण रूप से समझाने में असफल है. आचार्य महाब्राह्मण जाति की उत्पत्ति के मुख्य सिद्धांत निम्नानुसार हैं:- आचार्य, गुरु, पण्डित, विद्वान, महाब्राह्मण, कट्टाह ब्राह्मण, अचारज। -मृत्युोपरांत मोक्ष प्राप्ति हेतु ग्यारहवें की क्रिया-कर्म हवन-यज्ञ तथा पिण्डदान कराने वाली एक विशेष ब्राह्मण जाति या इस जाति का व्यक्ति । -इनको महा-ब्राह्मण या आचारज भी कहते हैं । ये अपनी परंपरा गर्ग ऋषि से लगाते हैं और बयान करते हैं कि जब राजा दशरथजी की मृत्यु हुई थी तो उनके आत्मा के मोक्ष के लिए ग्यारहवें दिन की क्रिया-कर्म व यज्ञ-हवन गर्ग ऋषि गर्ग वंश :बहुत से लोगों का गोत्र गर्ग है और बहुत से लोगों का उपनाम गर्ग है। सभी का संबंध गर्ग ऋषि से है। वैदिक ऋषि गर्ग आंगिरस और भारद्वाज के वंशज 33 मंत्रकारों में श्रेष्ठ थे। गर्गवंशी लोग ब्राह्मणों और वैश्यों (बनिये) दोनों में मिल जाएंगे महाराज दशरथजी का अंतिम किर्याकांड इन्ही गर्ग ऋषी ने करवाया था। +एक गर्ग ऋषि महाभारत काल में भी हुए थे, जो यदुओं के आचार्य थे जिन्होंने 'गर्ग संहिता' लिखी+ ने कराया और 5 ग्रास खीर, रोटी और चावल वगैरा के खाये थे। इस प्रकार पहली बार ऐसा संभव होने पर अन्य ऋषियों को आश्चर्य(अचरज) हुआ। उस दिन से उनका नाम ‘आचारज’ हुआ और मृत्यु उपरांत ग्यारहवें की क्रिया-कर्म और यज्ञ-हवन कराने और 5 ग्रास ग्यारहवें दिन खाने की रीति उनके वंश में जारी हो गई। इस प्रकार आत्मा के मोक्ष प्राप्ति हेतु किये गये कर्म को महान कर्मों में श्रेष्ठ स्थान प्राप्त हुआ और महान ऋषि-मुनियों एवम् भगवान राम से यह आशीर्वाद प्राप्त हुआ कि इस वंश के ब्राह्मणों द्वारा किये गए विधिवत यज्ञ-हवन, क्रिया कर्म तथा पिण्डदान से किसी भी आत्मा की शांति एवं मोक्ष प्राप्ति संभव होगी। इस प्रकार महान कर्मों के ज्ञाता होने तथा आत्मा के मोक्ष प्राप्ति के श्रेष्ठ कर्म को करने वाले ब्राह्मणों में महान एवं श्रेष्ठ कहलाये और इस वंश के ब्राह्मणों को महाब्राह्मण की उपाधि प्राप्त हुईं। यह सब सरयू नदी के तट से विस्थापित हुए। इस वंश को बढ़ाने और सम्पूर्ण मानव जाति के उद्धार हेतु राजा दशरथ की क्रिया के पश्चात् हर ब्राह्मण गोत्र से एक एक दम्पति मिलाकर इस ब्राह्मण जाति का गठन किया गया तथा ऋषि गर्ग से उस मोक्ष प्राप्ति हेतु ग्यारहवें की क्रिया-कर्म, यज्ञ-हवन तथा पिण्डदान करने की विधि की दीक्षा एवं ज्ञान प्राप्त किया। -आचार्य, गुरु, पण्डित, विद्वान, महाब्राह्मण। -कालांतर में यह जाति उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश, पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, उत्तराखण्ड एवं बिहार में निवास करती हैं। इसमें कई गोत्र हो गये हैं । इनकी अब कई खांपें पाई जाती हैं- 1. शांडिल्य, 2. कश्यप, 3. भारद्वाज, 4. सिनावड़, 5. बांवलिया,(मुंदगल)की शाखा 6. बागड़ी, 7. डलीवाल, 8. सारस्वत, 9. मामाणिया, 10. जोशी, 11. दायमा, 12. रावखड़, 13. वष्षीठ 14. आलावत, 15 डुसरीया 16 पिपलोदीया 17 राय बागडी 18 खार बागडी 19 डोलीया 20 डोलीया (पीपलोदीया)की शाखा 21 इन्दोरीया 22 ढाचोलिया 23 भुतडा 24 सान्डले( नागोरी)उपनाम 25 बेबरवाल 26श्री राम (गालरीया)की शाखा 27 गालरीया 28 पालीवाल 29 पलानिया 30 खंडेलवाल 31 सणावढ 32 तलपणिया 33 जोशी 34 राजगुरुया 35 दिल्लीवाल 36 तोषावड 37 बबेरवाल 38 पराणिया 39 मंडेलवाल 40 काटवी 41 गढगेसर 42 जाजपुरीया 43 सिवसक्त 44 मुदगल 45 सीखवाल 46 बागोरीया 47 संकवाल 48 पांडे 49 तिवारी 50 सुलानका 51 मिश्रा 52 पारासर 53 दुब्बे 54 चोबे 55 पाठक 56 बीलवाल 57 गोतम 58 सारसुद 59 बनावत 60 कोटल्य 61 वत्स 62 झा 63 कात्यान 64 गोड (अत्री) 65कोशीक वर्तमान जेसे जेसे वंश बढोतरी होती गइ ओर इन गोत्रो मे उप गोत्र भी जुडने के कारण सामील हे क्योकी असल गोत्र 42 ही थी लेकीन बाद मे 23गोत्र उपनाम की ओर जुडने से कुल 65गोत्र हुइ मेने केवल गोत्रो का संगलन्न किया हे बाकी जाती इतिहास लेख से जानकारी करके आप लोगो तक पहुचाया हे गोत्र संगलन्न कर्ता ज्वालाप्रसाद सिणगारा ये शिव धर्म को मानते हैं और महादेवजी को पूजते हैं। इनमें दारू मांस से ये परहेज करते हैं । परंतु कालांतर में यह जाति अधिक पिछङ गईं, अशिक्षा एवं गरीबी से त्रस्त इस वंश के ब्राह्मण अपने कर्म ज्ञान से विमुख हो गये, और अपना ज्ञानवर्धन की जगह मृत्युोपरांत अधिक दान प्राप्ति के लालच में अपने कर्म से गिर कर अपने वंश की मर्यादा भूल गए और कुछ निर्लज्ज लोग अशुद्ध दान ग्रहण करने लगे। तथा अपने मूल कर्म से गिर गये। इस प्रकार गिरे हुए कृत्यों तथा अशुद्ध दान से अन्य ब्राह्मणों ने इनका साथ छोड़ कर इन्हें निम्न स्तर के ब्राह्मण जैसा व्यवहार कर पिछङा बना दिया। कालांतर में यह जाति अपना यश,कीर्ति एवं ख्याति खोकर तथा अपनी वैदिक धर्म एवं कर्म से विमुख अंधकारमय जीवन जी रही हैं। परंतु पिछले दो दशकों में यह जाति अपने कर्म से ऊपर उठकर शिक्षा की ओर अग्रसर हुईं हैं। अच्छी शिक्षा और जीवन स्तर में आधुनिक एवं अभूतपूर्व परिवर्तन से यह जाति अपना यश एवं कीर्ति पुनः प्राप्ति की ओर अग्रसर है। अच्छे संस्कार और संस्कृति को अपनाकर ज्ञानवर्धन के माध्यम से अपनी धूमिल छवि को अच्छी करने में जुटे हुए हैं। दान दक्षिणा का त्याग कर स्वरोजगार करके अपने जीवन को मधुर एवं सम्मानित बना रहे हैं। उपयुक्त गोत्र जानकारी मे कोइ गोत्र को भुल वस नही लिख पाया हु तो कृपया मुझे अवगत करवाए ताकी मे भुली हुइ गोत्र को ओर एड कर सकु ओर अगली पोस्ट मे हर गोत्र की कुलदेवी व कुल देवता आदी की संप्रुण जानकारी मे आप सब के समक्ष रखुगा । 💐ज्वालाप्रसाद आचार्य सिणगारा💐

 वंश आधारित समाज : वैदिक काल में वंश पर आधारित समाज बने, जैसे पूर्व में 3 ही वंशों का प्रचलन हुआ। 1. सूर्य वंश, 2. चंद्र वंश और 3. ऋषि वंश। उक्त तीनों वंशों के ही अनेक उप वंश होते गए। यदु वंश, सोम वंश और नाग वंश तीनों चंद्र वंश के अंतर्गत माने जाते हैं। अग्नि वंश और इक्ष्वाकु वंश सूर्य वंश के अंतर्गत हैं। सूर्य वंशी प्रतापी राजा इक्ष्वाकु से इक्ष्वाकु वंश चला। इसी इक्ष्वाकु कुल में राजा रघु हुए जिसने रघु वंश चला। भगवान राम जहां सूर्य वंश से थे, वहीं भगवान श्रीकृष्ण चंद्र वंश से थे। ऋषि वशिष्ठ ने भी एक अग्नि वंश चलाया था। ऋषि वंश: इसी प्रकार मरीचि, अत्रि, अंगिरा, पुलस्त्य, पुलह, कृतु, भृगु, वशिष्ठ, दक्ष, कर्दम, विश्वामित्र, पराशर, गौतम, कश्यप, भारद्वाज, जमदग्नि, अगस्त्य, गर्ग, विश्वकर्मा, शांडिल्य, रौक्षायण, कपि, वाल्मीकि, दधीचि, कवास इलूसू, वत्स, काकसिवत, वेद व्यास आदि ऋषियों के वंश चले, जो आगे चलकर भिन्न-भिन्न उपजातियों में विभक्त होते गए। आचार्य महाब्राह्मण जाति की उत्पत्ति के अनेक सिद्धान्त समय-समय पर इतिहासकारों द्वारा प्रतिपादित किये हैं. परन्तु कोई भी एक अकेला सिद्धांत इस जात...

🌹मे आचार्य ज्वालाप्रसाद 🌹 सबसे पहले मे आप सब से हाथ जोड कर माफी मागता हु ! अगर मेरे शब्दो से आप लोग जरा भी आहत हुए तो मुझे अज्ञानी समझ कर माफ कर देना ?🙏🙏लेकीन एक बात जरुर याद रखना? जो फार्मुला मे आप सब को बता रहा हु यही आखीर मे सफल होगा ? समाज पिछडी क्यो हे दबी कुछली क्यो आखीर हमारे समाज बंधु अपनी जाती क्यो छुपाते हे ? आखीर हमारे नन्हे मुन्ने बच्चे जो स्कुल मे अपने ही सहपाटीयो के साथ हमारी जाती के नाम पर शर्मीदा क्यो हो रहे हे ? कभी आप लोगो ने इसका कारण जानने की कोशीस की हे ? शायद नही? जो लोग पंडीताइ व लालच वस अपना ज्ञान देते हे की हम महाब्राह्मणो का कर्म हे श्राद करवाना हम इसको केसे छोड सकते साथ मे यह भी ज्ञान देते की हमारा कर्म बुरा नही हमारा कर्म कराने का तरीका गलत हे!तरीका कुछ भी गलत नही हे हमारी समाज हजारो वर्षो से यह मृत्यु संस्कार करवाती आ रही हे आपको इस कर्म से मिला क्या हे सिवाय छुवाछुत के यह सब ज्ञान ही आज हमारी समाज को नीचा दिखा रहा हे अगर पंडीताइ का इतना ही घमंड हे तो शुभ कार्य की पंडताइ करो आपको रोक कोन रहा लेकीन प्लीज इस असुभ श्राद कर्म पर अपना ज्ञान देकर समाज के युवाओ को गुमरहा न किया जाय ! चाहे आप लोग कितना ही शुद्री करन से श्राद कर्म करवाओ लेकीन दान तो आपका मृत्यु का ही कहलायेगा इस लिए मेरे सुझाओ पर मनन जरुर करना आज से 50 वर्ष पहले एसी कइ जातीया थी जो अभी st केटीगरी आती हे जो कभी चमडा उतारने का काम किया करते थे कइ जातीया चमडे का जुता चप्पल बनाया करते थे आज उन जातीयो ने चमडे का काम बिलकुल ही बंद कर दीया हे !आज आपको बाजार मे चमडे के जुते चप्पल बहुत ही मुस्कील से मिलेगे सब जुते चप्पल आजकल रेगजीन प्लास्टीक के आने लगे हे क्योकी जब लोगो ने चमडे का काम करना बंद ही कर दिया तो फीर चमडे का समान कहा से आयेगा एसा भी नही हे की देश मे पशुओ की कमी हे हजारो लाखो पशु अपनी मोत से मरते हे लेकीन आज उनका चमडा उतारने वाला कोइ नही हे इस लिए गंदी जगहो पर उन पशुओ का शव युही सडते हुए पडे रहता हे? अब सवाल यह उठता हे की जब जमडे का काम करने वाली जातीयो का तो कर्म ही पशुओ का चमडा उतारना व उस चमडे से जुते चप्पल व अन्य समान बनाना था तो उन्होने अपना पुस्तेनी कर्म क्यो छोड दिया जब जीस कर्म के कारण जीस जाती को अन्य समाज के लोग हिन दश्ट्री से देखने लगे तो वो कर्म ही क्या कर्म हे जीससे लज्जीत होना पडे ? इस लिए कइ जातीयो ने अपना पुश्तेनी कर्म छोड कर मेहनत मजदुरी करके अपने परीवार का पालन पोसन करने लगे तब से आज उन लोगो की समाजीक व आर्थीक स्तीथी उच्च क्वालटी की बनने लगी हे आचार्य ब्राह्मण समाज के लोगो के सामने कुछ उदाहरण दे रहा हु राजस्थान मे भीलवाडा उदयपुर व अजमेर तीन एसे जीला हे जीसमे हमारी समाज की जनसख्या सबसे ज्यादा हे आज से 50 वर्ष पहले इन तीनो जिला मे रहने वाले आचार्य महाब्राह्मणो की स्तथी कभी बहुत खराब हुवा करती थी लेकीन कुछ युवाओ व समाज के सिक्षीत लोगो ने एक बहुत अच्छा निर्णीय लिया था जीतने भी लोग ग्यारवे दीन पर मृत्यु दान लेते थे उन सब ने दान न लेने की कसम खाकर सब लोग मेहनत मजदुरी करके अपने परिवार का भरण पोसण करने लगे थे तब से इन तीनो जीला मे हमारी समाज के लोग सबसे ज्यादा सरकारी नोकरी मे हे आज! इन तीनो जिलो मे 36 जातीया शादी विवहा व अन्य फक्सनो मे जीमणे आते हे ओर बुलाते हे छुवाछुत का नामोनिसान नही हे यह सब इस लिए हुआ की इन तीनो जीला के लोगो ने अपने पुस्तेनी कर्म का मोह त्याग कर मेहनत मजदुरी पर ध्यान दिया जिसका नतीजा बहुत ही अच्छा व इज्जत भरा नीकला था आज जीस दोर से हमारी समाज गुजर रही हे इसका अंत अच्छा नही होगा क्योकी आने वाले समय मे हमारी समाज के दो भाग होना निश्चय हे क्योकी कुछ हट्टी लालजी व कर्म को महान मानने वाले लोग इस श्राद कर्म को कभी नही छोडेंगे !ओर जीन 70% लोगो ने इस कर्म का त्याग कर दीया हे सायद वो लोग इन कर्मकांडी महाब्राह्मणो के साथ रहना पशंद नही करेंगे इस लिए जीन लोगो ने श्राद कर्म का त्याग कर दिया हे वो आचार्य ब्राह्मण नाम से विख्यात होगे ओर जीन लोगो को श्राद कर्म महान लगता हे वो महाब्राह्मण नाम से विख्यात होने वाले हे मेरे आदरणीय समाज बंधुओ जब हमे अपना खुद का ही पता नही हे की हमारे मरने के बाद मोक्ष होगा या नही तो आप दुसरे का केसे मोक्ष कर सकते हो यह लोगो को मुर्ख बनाने का कर्म हे गीताजी मे साफ साफ लिखा हे की प्राणी को मोक्ष उस प्राणी के कर्मो के अनुसार मिलती हे ! तो फीर आप लोग भगवान से बडे हो क्या जो आप किसी भी प्राणी को मोक्ष प्रदान कर सकते हो मुसलमान इसाइ जेन बोध्द इन धर्म को मानने वालो की मोक्ष कोन करता होगा क्योकी यह लोग आप से श्राद कर्म तो करवाते नही हे फीर इनकी मोक्ष केसे होती होगी जरा विचार करो भगवान व अल्लहा ओर इश्वर सब एक ही हे इस पृथ्वी पर अलग अलग धर्म के लिए अलग अलग भगवान नही हे सबका भगवान एक ही हे इस लिए श्राद कर्म मे सिवाय छुवाछुत के अलावा कुछ नही हे इसका त्याग करना ही समाज को उचा उठाना हे

 🌹मे आचार्य ज्वालाप्रसाद 🌹 सबसे पहले मे आप सब से हाथ जोड कर माफी मागता हु ! अगर मेरे शब्दो से आप लोग जरा भी आहत हुए तो मुझे अज्ञानी समझ कर माफ कर देना ?🙏🙏लेकीन एक बात जरुर याद रखना? जो फार्मुला मे आप सब को बता रहा हु यही आखीर मे सफल होगा ? समाज पिछडी क्यो हे दबी कुछली क्यो आखीर हमारे समाज बंधु अपनी जाती क्यो छुपाते हे ? आखीर हमारे नन्हे मुन्ने बच्चे जो स्कुल मे अपने ही सहपाटीयो के साथ हमारी जाती के नाम पर शर्मीदा क्यो हो रहे हे ? कभी आप लोगो ने इसका कारण जानने की कोशीस की हे ? शायद नही? जो लोग पंडीताइ व लालच वस अपना ज्ञान देते हे की हम महाब्राह्मणो का कर्म हे श्राद करवाना हम इसको केसे छोड सकते साथ मे यह भी ज्ञान देते की हमारा कर्म बुरा नही हमारा कर्म कराने का तरीका गलत हे!तरीका कुछ भी गलत नही हे हमारी समाज हजारो वर्षो से यह मृत्यु संस्कार करवाती आ रही हे आपको इस कर्म से मिला क्या हे सिवाय छुवाछुत के  यह सब ज्ञान ही आज हमारी समाज को नीचा दिखा रहा हे अगर पंडीताइ का इतना ही घमंड हे तो  शुभ कार्य की पंडताइ करो आपको रोक कोन रहा लेकीन प्लीज इस असुभ श्राद कर्म पर अपना ज्ञान ...