*🕉️*आचार्य ब्रह्मण महाब्राह्मण,गुरु,तारक,अचारी, विद्वान, पंडित, अचारज,आचार्य नामित ब्राह्मण समाज। 🕉️* शास्त्रों के अनुसार मनुष्य जन्म में सोलह प्रकार के संस्कार संपादित करने की परंपरा का सदियों से पालन किया जा रहा है।इसी क्रम में मृत्योपरांत सोलहवां संस्कार अंतिम संस्कार है जिसके पश्चात आत्मा एक पींड में परिवर्तित हो मृत्यु पश्चात सांसारिक बंधनों से मुक्ति चाहती है इस हेऐ मृत्यु होने के दसवें,ग्यारहवें दिन विधि विधान से कर्मकांड ब्राह्मण वर्ग विशेष से सम्पन्न करवाने का विधान है। इस संदर्भ में किंवदंती है कि भगवान श्रीराम वनवास अवधि समाप्त कर अयोध्या लोटे तो इस अवधि के दौरान दिवंगत हुए पिता श्री दशरथ जी द्वारा स्वप्न में आकर *हे राम हे राम* के शब्दोचारण का श्रीराम को आभास हुआ। इस घटनाक्रम को उन्होंने अपने कुल गुरु वशिष्ठ जी के संज्ञान में लाया जिसे वशिष्ठ जी ने गंभीरता से सहमंत्रणा हेतु ऋषि भारद्वाज जी के आश्रम पहूंचे। ऋषि भारद्वाज जी ने अपने अलौकिक दिव्य दृष्टि शक्ति से पाया कि राजा दशरथ जी की आत्मा की मुक्ति के लिए विधि विधान से कर्मकांड क्रिया नहीं होने...