शास्त्रों के अनुसार मनुष्य जन्म में सोलह प्रकार के संस्कार संपादित करने की परंपरा का सदियों से पालन किया जा रहा है।इसी क्रम में मृत्योपरांत सोलहवां संस्कार अंतिम संस्कार है जिसके पश्चात आत्मा एक पींड में परिवर्तित हो मृत्यु पश्चात सांसारिक बंधनों से मुक्ति चाहती है इस हेऐ मृत्यु होने के दसवें,ग्यारहवें दिन विधि विधान से कर्मकांड ब्राह्मण वर्ग विशेष से सम्पन्न करवाने का विधान है। इस संदर्भ में किंवदंती है कि भगवान श्रीराम वनवास अवधि समाप्त कर अयोध्या लोटे तो इस अवधि के दौरान दिवंगत हुए पिता श्री दशरथ जी द्वारा स्वप्न में आकर *हे राम हे राम* के शब्दोचारण का श्रीराम को आभास हुआ। इस घटनाक्रम को उन्होंने अपने कुल गुरु वशिष्ठ जी के संज्ञान में लाया जिसे वशिष्ठ जी ने गंभीरता से सहमंत्रणा हेतु ऋषि भारद्वाज जी के आश्रम पहूंचे। ऋषि भारद्वाज जी ने अपने अलौकिक दिव्य दृष्टि शक्ति से पाया कि राजा दशरथ जी की आत्मा की मुक्ति के लिए विधि विधान से कर्मकांड क्रिया नहीं होने के अभाव में उनकी आत्मा मोक्ष को प्राप्त नहीं हुई। इस पर मंथन और शोध हेतु भारद्वाज जी द्वारा ऋषि मुनियों विद्वानों को आमंत्रित किया गया कि किस तरह, कैसे और कौन मोक्ष प्रदान करने की योग्यता रखते हैं।तत्समय भारद्वाज जी के ज्येष्ठ पुत्र ऋषि गर्ग समस्त वेद,शास्त्र, पुराण, उपनिषद् आदि में निपुण सर्वश्रेष्ठ श्रेणी की योग्यता रखते थे अतःमहर्षि गर्गाचार्य जी का जन्म अंगिरस गौत्र में हुआ। इनके पिता का नाम भुवमन्यु था ये मुनि भरद्वाज जी के पौत्र व देवगुरु बृहस्पति जी के प्रपौत्र हुए उन्हें सर्व मान्य कर राजा दशरथ जी की आत्मा को मोक्ष प्रदान कराने के लिए शास्त्रोक्त विधि विधान की प्रक्रिया संपादित करने के लिए अधिकृत किया गया। विद्वान ऋषि गर्ग ने प्रत्येक ब्राह्मण वर्ग से शास्त्रो के विद्वान और ज्ञानी लोगों की संयुक्त पंक्ति में मंत्रोच्चार पद्धति से सरयू नदी तट पर यज्ञ हवन आदि से विधिवत कर्मकांड करवाने के लिए पींड में परिवर्तित जीवात्मा के प्रतीक स्वरूप पींड बनवाकर उनकी पूजा सामग्री,पुष्पादि, खीर, मिष्ठान एवं भोज्य पदार्थों आदि से ज्येष्ठ पुत्र श्रीराम से पूजन,हवनादि कर्म संपन्न करवाया। इस मोक्ष कर्म में सहभागी साक्ष्य रहे ब्राह्मणों को श्रीराम ने सम्मानित कर दान स्वरूप यथोचित दक्षिणा उपहार आदि प्रदान किए। जब दशरथ जी की अतृप्त आत्मा को मोक्ष की प्राप्त हुई तो यह तथ्य एक अचरज सा लगा और इस ब्राह्मण समुदाय को ब्राह्मण वर्ण में सर्वश्रेष्ठ *आचार्य महाब्राह्मण* की उपाधि की पहचान दी गई जो कालांतर में अपभ्रंश हो *अचारज महाब्राह्मण* हो गया।
मृत्यू उपरांत आत्मा की मोक्ष दिलाने की योग्यता रखने वाले इस श्रेष्ठतम समुदाय से ब्राह्मण क्षत्रिय और वैश्य समाज के जन अपने परिवार में दिवंगत होने वाले सदस्य की आत्मा की मोक्ष के लिए सादर आमंत्रित कर विधि विधान से कर्म कांड सम्पन्न करवाते हैं।वर्तमान में इस समुदाय को *अचारज,महाब्राह्मण,महापात्र, गौर पण्डित तारक, अचारी,आचार्य ब्राह्मण* आदि से अलग अलग क्षेत्रों में जाना जाता है जो अपने नाम के साथ पांडे, चतुर्वेदी, द्विवेदी, शर्मा, आचार्य, शांडिल्य कश्यप ,कौशिक,तिवारी आदि अनेकानेक उपनाम लगाते हैं।इस समाज के इतिहास ओर पूर्वजों की जानकारी देने वाली राजस्थान राज्य में पारंपरिक पुस्तक सैकड़ों सालों से सहेजी हुई बड़वा / भाटजी की प्रचलित पोथी में *आदि गौड़ ब्राह्मण नाम* से समाज का होना उल्लेखित कर रखा हुवा प्रमाणिक और ऐतिहासिक साक्ष्य उपलब्ध हे।।
कालांतर में यह समुदाय सरयू नदी के तट से विस्थापित हो देश के हर प्रदेश में जाकर निवासित हुआ जहां जन मानस की मोक्ष के लिए दसवें ग्यारहवें दिन की कर्मकांडी क्रिया कर्म, यज्ञ हवनादि तथा पीण्डदान का कर्मकांड करवाने का दायित्व निभाते हैं।
इस समुदाय में निम्नलिखित गोत्र और खांपें पाई जाती है:---
1. शाण्डिल्य (नागौरिया),
2. कश्यप,
3. भारद्वाज,
4. सिनावड़,
5. बांवलिया,
6. बागड़ी,
7. डलीवाल,
8. सारस्वत,
9. ममाणिया, कुल देवी चामुन्डा माता गांव भाटार जिला चितोड गढ
10. जोशी,
11. दायमा(दाधीच)
12. रावखड़,
13. पीपलोदिया,
14. अलावत,
15 ढूसरीया
16 पिपलोदीया
17 राय बागडी
18 खर बागडी
19 डोलीया
20 डोलीया पीपलोदीया
21 इन्दोरीया
22 ढांचोलिया
23 भुतडा
24 सान्डले
25 बेबरवाल
26श्री राम गालरीया
27 गालरीया
28 पालीवाल
29 पलानिया
30 खंडेलवाल
31 सणावढ
32 तलपणिया
33 जोशी
34 राजगुरुया
35 दिल्लीवाल
36 तोषावड
37 बबेरवाल
38 पराणिया
39 मंडेलवाल
40 काटवी
41 गढगेसर
42 जाजपुरीया
43 सिवशक्त
44 मुदगल
45 सिखवाल
46 बागोरीया
47 संकवाल
48 पांडे
49 तिवारी
50 सुलानखा
51 मिश्रा
52 पारासर
53 दुब्बे
54 चोबे
55 पाठक
56 बीलवाल
57 गोतम
58 सारसुद
59 बनावत
60 कोटल्य
61 वत्स
62 झा
63औझा
64अतरी
65 कात्यायन
66 कोशीक
यह समुदाय शिव धर्म का पालन कर देवाधिदेव महादेव जी को अपना आराध्य मानते हुए ब्राह्मणत्व कर्म का पालन करता है।
चूंकि वर्तमान में जजमान और यजमानी मात्र से आजीविका निर्वहन होना असंभव हो गया है अतः पिछले कई दशकों से यह समाज अन्य ब्राह्मण भाइयों की तरह शनै शनै अपने परंपरागत पांडित्य से विमुख हो रहा है। यह जाति अपने कर्म से ऊपर उठ कर शिक्षा की ओर अग्रसर हुई हे,,अच्छी शिक्षा और जीवन स्तर में आधुनिक एवम अभूतपूर्व परिवर्तन से यह जाति अपना यश और कीर्ति कायम बनाने की ओर अग्रसर है और समाज में लगभग 80% जन शिक्षित होकर नौकरी एवं निजी व्यवसायों से संलग्न हो रखे होकर समाज के सर्वांगीण विकास एवं राष्ट्रीय एकीकरण की ओर अग्रसर हो रहें हैं। इस आचार्य समाज के समाज बंधु व माताये- बहने अनेक राजकीय सेवाओ में छोटे से बड़े पदो पर आसीन होकर तथा व्यापारिक गतिविधियों में अपनी महत्ती भूमिका निभा कर एवं राजनेतिक भागीदारी में हिस्सा लेकर देश और समाज की उन्नति को बढ़ाने में निरंतर कार्य कर रहे हे।।
इस समाज को राष्ट्रीय ओर प्रत्येक क्षेत्र में सामाजिक पहचान को प्रशस्त करने समाज के अनेक समाजप्रेमी अपनी अपनी योग्यता और सामर्थ्य अनुसार समाज का यशस्वी उत्थान करने में अपनी अपनी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हे।।।
धन्यवाद महात्म्य🙏🙏
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