सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं
अगर चुनावी परिणाम से आप दुःखी,आहत है तो यकीन मानिए आप सच्चे हिन्दुस्तानी है

टिप्पणियाँ

एक टिप्पणी भेजें

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

आचार्य महाब्राह्मण ईतिहाष व गोत्र सुची

 *🕉️*आचार्य ब्रह्मण महाब्राह्मण,गुरु,तारक,अचारी, विद्वान, पंडित, अचारज,आचार्य नामित ब्राह्मण समाज। 🕉️* शास्त्रों के अनुसार मनुष्य जन्म में सोलह प्रकार के संस्कार संपादित करने की परंपरा का सदियों से पालन किया जा रहा है।इसी क्रम में मृत्योपरांत  सोलहवां संस्कार अंतिम संस्कार है जिसके पश्चात आत्मा एक पींड में परिवर्तित हो मृत्यु पश्चात सांसारिक बंधनों से मुक्ति चाहती है इस हेऐ मृत्यु होने के दसवें,ग्यारहवें दिन विधि विधान से  कर्मकांड ब्राह्मण वर्ग विशेष से सम्पन्न करवाने का विधान है। इस संदर्भ में किंवदंती है कि भगवान श्रीराम वनवास अवधि समाप्त कर अयोध्या लोटे तो इस अवधि के दौरान दिवंगत हुए पिता श्री दशरथ जी द्वारा स्वप्न में आकर *हे राम हे राम* के शब्दोचारण  का श्रीराम को आभास हुआ। इस घटनाक्रम को उन्होंने अपने कुल गुरु वशिष्ठ जी के संज्ञान में लाया जिसे वशिष्ठ जी ने गंभीरता से सहमंत्रणा हेतु  ऋषि भारद्वाज जी के आश्रम पहूंचे। ऋषि भारद्वाज जी ने अपने अलौकिक दिव्य दृष्टि शक्ति से पाया कि राजा दशरथ जी की आत्मा की मुक्ति के लिए विधि विधान से कर्मकांड क्रिया नहीं होने...

वंश आधारित समाज : वैदिक काल में वंश पर आधारित समाज बने, जैसे पूर्व में 3 ही वंशों का प्रचलन हुआ। 1. सूर्य वंश, 2. चंद्र वंश और 3. ऋषि वंश। उक्त तीनों वंशों के ही अनेक उप वंश होते गए। यदु वंश, सोम वंश और नाग वंश तीनों चंद्र वंश के अंतर्गत माने जाते हैं। अग्नि वंश और इक्ष्वाकु वंश सूर्य वंश के अंतर्गत हैं। सूर्य वंशी प्रतापी राजा इक्ष्वाकु से इक्ष्वाकु वंश चला। इसी इक्ष्वाकु कुल में राजा रघु हुए जिसने रघु वंश चला। भगवान राम जहां सूर्य वंश से थे, वहीं भगवान श्रीकृष्ण चंद्र वंश से थे। ऋषि वशिष्ठ ने भी एक अग्नि वंश चलाया था। ऋषि वंश: इसी प्रकार मरीचि, अत्रि, अंगिरा, पुलस्त्य, पुलह, कृतु, भृगु, वशिष्ठ, दक्ष, कर्दम, विश्वामित्र, पराशर, गौतम, कश्यप, भारद्वाज, जमदग्नि, अगस्त्य, गर्ग, विश्वकर्मा, शांडिल्य, रौक्षायण, कपि, वाल्मीकि, दधीचि, कवास इलूसू, वत्स, काकसिवत, वेद व्यास आदि ऋषियों के वंश चले, जो आगे चलकर भिन्न-भिन्न उपजातियों में विभक्त होते गए। आचार्य महाब्राह्मण जाति की उत्पत्ति के अनेक सिद्धान्त समय-समय पर इतिहासकारों द्वारा प्रतिपादित किये हैं. परन्तु कोई भी एक अकेला सिद्धांत इस जाति की उत्पत्ति को पूर्ण रूप से समझाने में असफल है. आचार्य महाब्राह्मण जाति की उत्पत्ति के मुख्य सिद्धांत निम्नानुसार हैं:- आचार्य, गुरु, पण्डित, विद्वान, महाब्राह्मण, कट्टाह ब्राह्मण, अचारज। -मृत्युोपरांत मोक्ष प्राप्ति हेतु ग्यारहवें की क्रिया-कर्म हवन-यज्ञ तथा पिण्डदान कराने वाली एक विशेष ब्राह्मण जाति या इस जाति का व्यक्ति । -इनको महा-ब्राह्मण या आचारज भी कहते हैं । ये अपनी परंपरा गर्ग ऋषि से लगाते हैं और बयान करते हैं कि जब राजा दशरथजी की मृत्यु हुई थी तो उनके आत्मा के मोक्ष के लिए ग्यारहवें दिन की क्रिया-कर्म व यज्ञ-हवन गर्ग ऋषि गर्ग वंश :बहुत से लोगों का गोत्र गर्ग है और बहुत से लोगों का उपनाम गर्ग है। सभी का संबंध गर्ग ऋषि से है। वैदिक ऋषि गर्ग आंगिरस और भारद्वाज के वंशज 33 मंत्रकारों में श्रेष्ठ थे। गर्गवंशी लोग ब्राह्मणों और वैश्यों (बनिये) दोनों में मिल जाएंगे महाराज दशरथजी का अंतिम किर्याकांड इन्ही गर्ग ऋषी ने करवाया था। +एक गर्ग ऋषि महाभारत काल में भी हुए थे, जो यदुओं के आचार्य थे जिन्होंने 'गर्ग संहिता' लिखी+ ने कराया और 5 ग्रास खीर, रोटी और चावल वगैरा के खाये थे। इस प्रकार पहली बार ऐसा संभव होने पर अन्य ऋषियों को आश्चर्य(अचरज) हुआ। उस दिन से उनका नाम ‘आचारज’ हुआ और मृत्यु उपरांत ग्यारहवें की क्रिया-कर्म और यज्ञ-हवन कराने और 5 ग्रास ग्यारहवें दिन खाने की रीति उनके वंश में जारी हो गई। इस प्रकार आत्मा के मोक्ष प्राप्ति हेतु किये गये कर्म को महान कर्मों में श्रेष्ठ स्थान प्राप्त हुआ और महान ऋषि-मुनियों एवम् भगवान राम से यह आशीर्वाद प्राप्त हुआ कि इस वंश के ब्राह्मणों द्वारा किये गए विधिवत यज्ञ-हवन, क्रिया कर्म तथा पिण्डदान से किसी भी आत्मा की शांति एवं मोक्ष प्राप्ति संभव होगी। इस प्रकार महान कर्मों के ज्ञाता होने तथा आत्मा के मोक्ष प्राप्ति के श्रेष्ठ कर्म को करने वाले ब्राह्मणों में महान एवं श्रेष्ठ कहलाये और इस वंश के ब्राह्मणों को महाब्राह्मण की उपाधि प्राप्त हुईं। यह सब सरयू नदी के तट से विस्थापित हुए। इस वंश को बढ़ाने और सम्पूर्ण मानव जाति के उद्धार हेतु राजा दशरथ की क्रिया के पश्चात् हर ब्राह्मण गोत्र से एक एक दम्पति मिलाकर इस ब्राह्मण जाति का गठन किया गया तथा ऋषि गर्ग से उस मोक्ष प्राप्ति हेतु ग्यारहवें की क्रिया-कर्म, यज्ञ-हवन तथा पिण्डदान करने की विधि की दीक्षा एवं ज्ञान प्राप्त किया। -आचार्य, गुरु, पण्डित, विद्वान, महाब्राह्मण। -कालांतर में यह जाति उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश, पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, उत्तराखण्ड एवं बिहार में निवास करती हैं। इसमें कई गोत्र हो गये हैं । इनकी अब कई खांपें पाई जाती हैं- 1. शांडिल्य, 2. कश्यप, 3. भारद्वाज, 4. सिनावड़, 5. बांवलिया,(मुंदगल)की शाखा 6. बागड़ी, 7. डलीवाल, 8. सारस्वत, 9. मामाणिया, 10. जोशी, 11. दायमा, 12. रावखड़, 13. वष्षीठ 14. आलावत, 15 डुसरीया 16 पिपलोदीया 17 राय बागडी 18 खार बागडी 19 डोलीया 20 डोलीया (पीपलोदीया)की शाखा 21 इन्दोरीया 22 ढाचोलिया 23 भुतडा 24 सान्डले( नागोरी)उपनाम 25 बेबरवाल 26श्री राम (गालरीया)की शाखा 27 गालरीया 28 पालीवाल 29 पलानिया 30 खंडेलवाल 31 सणावढ 32 तलपणिया 33 जोशी 34 राजगुरुया 35 दिल्लीवाल 36 तोषावड 37 बबेरवाल 38 पराणिया 39 मंडेलवाल 40 काटवी 41 गढगेसर 42 जाजपुरीया 43 सिवसक्त 44 मुदगल 45 सीखवाल 46 बागोरीया 47 संकवाल 48 पांडे 49 तिवारी 50 सुलानका 51 मिश्रा 52 पारासर 53 दुब्बे 54 चोबे 55 पाठक 56 बीलवाल 57 गोतम 58 सारसुद 59 बनावत 60 कोटल्य 61 वत्स 62 झा 63 कात्यान 64 गोड (अत्री) 65कोशीक वर्तमान जेसे जेसे वंश बढोतरी होती गइ ओर इन गोत्रो मे उप गोत्र भी जुडने के कारण सामील हे क्योकी असल गोत्र 42 ही थी लेकीन बाद मे 23गोत्र उपनाम की ओर जुडने से कुल 65गोत्र हुइ मेने केवल गोत्रो का संगलन्न किया हे बाकी जाती इतिहास लेख से जानकारी करके आप लोगो तक पहुचाया हे गोत्र संगलन्न कर्ता ज्वालाप्रसाद सिणगारा ये शिव धर्म को मानते हैं और महादेवजी को पूजते हैं। इनमें दारू मांस से ये परहेज करते हैं । परंतु कालांतर में यह जाति अधिक पिछङ गईं, अशिक्षा एवं गरीबी से त्रस्त इस वंश के ब्राह्मण अपने कर्म ज्ञान से विमुख हो गये, और अपना ज्ञानवर्धन की जगह मृत्युोपरांत अधिक दान प्राप्ति के लालच में अपने कर्म से गिर कर अपने वंश की मर्यादा भूल गए और कुछ निर्लज्ज लोग अशुद्ध दान ग्रहण करने लगे। तथा अपने मूल कर्म से गिर गये। इस प्रकार गिरे हुए कृत्यों तथा अशुद्ध दान से अन्य ब्राह्मणों ने इनका साथ छोड़ कर इन्हें निम्न स्तर के ब्राह्मण जैसा व्यवहार कर पिछङा बना दिया। कालांतर में यह जाति अपना यश,कीर्ति एवं ख्याति खोकर तथा अपनी वैदिक धर्म एवं कर्म से विमुख अंधकारमय जीवन जी रही हैं। परंतु पिछले दो दशकों में यह जाति अपने कर्म से ऊपर उठकर शिक्षा की ओर अग्रसर हुईं हैं। अच्छी शिक्षा और जीवन स्तर में आधुनिक एवं अभूतपूर्व परिवर्तन से यह जाति अपना यश एवं कीर्ति पुनः प्राप्ति की ओर अग्रसर है। अच्छे संस्कार और संस्कृति को अपनाकर ज्ञानवर्धन के माध्यम से अपनी धूमिल छवि को अच्छी करने में जुटे हुए हैं। दान दक्षिणा का त्याग कर स्वरोजगार करके अपने जीवन को मधुर एवं सम्मानित बना रहे हैं। उपयुक्त गोत्र जानकारी मे कोइ गोत्र को भुल वस नही लिख पाया हु तो कृपया मुझे अवगत करवाए ताकी मे भुली हुइ गोत्र को ओर एड कर सकु ओर अगली पोस्ट मे हर गोत्र की कुलदेवी व कुल देवता आदी की संप्रुण जानकारी मे आप सब के समक्ष रखुगा । 💐ज्वालाप्रसाद आचार्य सिणगारा💐

 वंश आधारित समाज : वैदिक काल में वंश पर आधारित समाज बने, जैसे पूर्व में 3 ही वंशों का प्रचलन हुआ। 1. सूर्य वंश, 2. चंद्र वंश और 3. ऋषि वंश। उक्त तीनों वंशों के ही अनेक उप वंश होते गए। यदु वंश, सोम वंश और नाग वंश तीनों चंद्र वंश के अंतर्गत माने जाते हैं। अग्नि वंश और इक्ष्वाकु वंश सूर्य वंश के अंतर्गत हैं। सूर्य वंशी प्रतापी राजा इक्ष्वाकु से इक्ष्वाकु वंश चला। इसी इक्ष्वाकु कुल में राजा रघु हुए जिसने रघु वंश चला। भगवान राम जहां सूर्य वंश से थे, वहीं भगवान श्रीकृष्ण चंद्र वंश से थे। ऋषि वशिष्ठ ने भी एक अग्नि वंश चलाया था। ऋषि वंश: इसी प्रकार मरीचि, अत्रि, अंगिरा, पुलस्त्य, पुलह, कृतु, भृगु, वशिष्ठ, दक्ष, कर्दम, विश्वामित्र, पराशर, गौतम, कश्यप, भारद्वाज, जमदग्नि, अगस्त्य, गर्ग, विश्वकर्मा, शांडिल्य, रौक्षायण, कपि, वाल्मीकि, दधीचि, कवास इलूसू, वत्स, काकसिवत, वेद व्यास आदि ऋषियों के वंश चले, जो आगे चलकर भिन्न-भिन्न उपजातियों में विभक्त होते गए। आचार्य महाब्राह्मण जाति की उत्पत्ति के अनेक सिद्धान्त समय-समय पर इतिहासकारों द्वारा प्रतिपादित किये हैं. परन्तु कोई भी एक अकेला सिद्धांत इस जात...

गोगाजी भक्त पुरणमल आचार्य की कथा

 राजस्थान के लोक प्रिय देवता गोगा जी महाराज , के परम भगत पूर्णमल आचार्य 🙏 नोरंगदेसर, बीकानेर जिला, विक्रम संवत 1716  वर्तमान में, देराजसर, चुरू जिला, ईस्वी सन्,1659  नोरंगदेसार का ठाकुर (राजा) मदन सिंह ( औरंगजेब का सेनायी टुकड़ी अध्यक्ष) था, और गांव का चौधरी स्वरूप राम थे, छोटी सी, 20 , 25 घरों की बस्ती थी,  गांव  में आचार्य समाज के  श्री भीयाराम जी s/०  दयाराम जी आचार्य, माता का नाम - रिद्धि देवी!  गोत्र - सारस्वत  नख - प्रवर  कुल देवी - भद्र काली, कलकता  कुल देव - भेरू गौरा, के घर पर विक्रम संवत 1576 पूर्णमल नामक एक पुत्र का जन्म हुवा, जो की अपने बालपन से ही गोगा जी के बारे में जानकारी और उन के लोक प्रसिद्ध पर्चो, के बारे में खूब सुन सुन कर ही बड़े हुवे,  धीरे धीरे, पिता के देहांत के चलते, घर की समस्त जिमेदारी पूर्ण मल पर आग्यी, और उनका घर बांधने के लिऐ समाज के बड़े बुजुर्ग उनका विवाह  साया - वर्तमान में शावा नाम से है, वाह कर दीया! एक दिन पूर्ण मल और उनकी मंडली गायों , उंठो, बल्द, बकरियां, भेड़े, इत्यादि को चलवाशी पशुव...