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लक्ष्मी की बहिन दरिद्रा की कथा 🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁 मां लक्ष्मी के परिवार में उनकी एक बड़ी बहन भी है जिसका नाम है- दरिद्रा। इस संबंध में एक पौराणिक कथा है कि इन दोनों बहनों के पास रहने का कोई निश्चित स्थान नहीं था इसलिये एक बार माँ लक्ष्मी और उनकी बड़ी बहन दरिद्रा श्री विष्णु के पास गई और उनसे बोली, जगत के पालनहार कृपया हमें रहने का स्थान दो? पीपल को विष्णु भगवान से वरदान प्राप्त था कि जो व्यक्ति शनिवार को पीपल की पूजा करेगा, उसके घर का ऐश्वर्य कभी नष्ट नहीं होगा अतः श्री विष्णु ने कहा, आप दोनों पीपल के वृक्ष पर वास करो। इस तरह वे दोनों बहनें पीपल के वृक्ष में रहने लगी। जब विष्णु भगवान ने माँ लक्ष्मी से विवाह करना चाहा तो लक्ष्मी माता ने इंकार कर दिया क्योंकि उनकी बड़ी बहन दरिद्रा का विवाह नहीं हुआ था। उनके विवाह के उपरांत ही वह श्री विष्णु से विवाह कर सकती थी। अत: उन्होंने दरिद्रा से पूछा, वो कैसा वर पाना चाहती हैं। तो वह बोली कि, वह ऐसा पति चाहती हैं जो कभी पूजा-पाठ न करे व उसे ऐसे स्थान पर रखे जहां कोई भी पूजा-पाठ न करता हो। श्री विष्णु ने उनके लिए ऋषि नामक वर चुना और दोनों विवाह सूत्र में बंध गए। अब दरिद्रा की शर्तानुसार उन दोनों को ऐसे स्थान पर वास करना था जहां कोई भी धर्म कार्य न होता हो। ऋषि उसके लिए उसका मन भावन स्थान ढूंढने निकल पड़े लेकिन उन्हें कहीं पर भी ऐसा स्थान न मिला। दरिद्रा उनके इंतजार में विलाप करने लगी। श्री विष्णु ने पुन: लक्ष्मी के सामने विवाह का प्रस्ताव रखा तो लक्ष्मी जी बोली, जब तक मेरी बहन की गृहस्थी नहीं बसती मैं विवाह नहीं करूंगी। धरती पर ऐसा कोई स्थान नहीं है। जहां कोई धर्म कार्य न होता हो। उन्होंने अपने निवास स्थान पीपल को रविवार के लिए दरिद्रा व उसके पति को दे दिया। अत: हर रविवार पीपल के नीचे देवताओं का वास न होकर दरिद्रा का वास होता है। अत: इस दिन पीपल की पूजा वर्जित मानी जाती है। पीपल को विष्णु भगवान से वरदान प्राप्त है कि जो व्यक्ति शनिवार को पीपल की पूजा करेगा, उस पर लक्ष्मी की अपार कृपा रहेगी और उसके घर का ऐश्वर्य कभी नष्ट नहीं होगा। इसी लोक विश्वास के आधार पर लोग पीपल के वृक्ष को काटने से आज भी डरते हैं, लेकिन यह भी बताया गया है कि यदि पीपल के वृक्ष को काटना बहुत जरूरी हो तो उसे रविवार को ही काटा जा सकता है। *विशेष ,,,,,,, मेरे मतानुसार "कालाधन " जो अनैतिक अथवा भ्रष्ट " तरीकों से कमाया जाता है वह लक्ष्मी जी की बहन दरिद्रा ही है ! जो क्रय शक्ति लक्ष्मी जी की है वही दरिद्रा की है ! अंतर केवल है की नेक कमाई उसी तरह फलती फूलती है जिस प्रकार कमल की अनेक पंखुड़िआ खिलने लगाती है ! मेरे अनुभव में ये कमल की पंखुड़िआ अनेक आय के स्रोतों का उत्पन्न होना है जो नेक कमाई से ही संभव है ! दूसरी तरफ काला धन अनेक आपदाओं व् विपदाओं को उत्पन्न करने वाला होता है ! यह प्रकृति से तामसिक होने के कारण अज्ञान एवं मनोविकारों ( विषय एवं वासनाओं ) को उत्पन्न करने वाला है ! अंत में दुर्लभ मनुष्य योनि के सत्व गुणों को नष्ट कर देता है ! ज्ञान का प्रकाश शनैः शनैः समाप्त होने लगता है ! आपदा एवं विपदाए सही मोके की इंतज़ार में रहती है ! मनुष्य मूढ़ बुद्धि होने लगता है और अंत में सबकुछ यहीं छोड़ कर चला जाता है ! जबकि लक्ष्मी वान "पुण्य " की कमाई करता है और साथ ले जाता है ! अतः " देवी दारिद्रा को लक्ष्मी समझने की भूल ना करे !" लक्ष्मी का वास परोपकारी के घर में स्थाई है ! अनैतिक एवं भ्रष्ट तरीकों से धन कमाने वाले मूढ़ प्राणी अपने घर में लक्ष्मी जी को आमंत्रित करने के स्थान पर दरिद्रा को आमंत्रित करते है जिससे कोई भी धार्मिक अनुष्ठान एवं परोपकार के कार्य संभव नहीं है या वे निष्फल और औपचारिकता मात्र होते है !

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वंश आधारित समाज : वैदिक काल में वंश पर आधारित समाज बने, जैसे पूर्व में 3 ही वंशों का प्रचलन हुआ। 1. सूर्य वंश, 2. चंद्र वंश और 3. ऋषि वंश। उक्त तीनों वंशों के ही अनेक उप वंश होते गए। यदु वंश, सोम वंश और नाग वंश तीनों चंद्र वंश के अंतर्गत माने जाते हैं। अग्नि वंश और इक्ष्वाकु वंश सूर्य वंश के अंतर्गत हैं। सूर्य वंशी प्रतापी राजा इक्ष्वाकु से इक्ष्वाकु वंश चला। इसी इक्ष्वाकु कुल में राजा रघु हुए जिसने रघु वंश चला। भगवान राम जहां सूर्य वंश से थे, वहीं भगवान श्रीकृष्ण चंद्र वंश से थे। ऋषि वशिष्ठ ने भी एक अग्नि वंश चलाया था। ऋषि वंश: इसी प्रकार मरीचि, अत्रि, अंगिरा, पुलस्त्य, पुलह, कृतु, भृगु, वशिष्ठ, दक्ष, कर्दम, विश्वामित्र, पराशर, गौतम, कश्यप, भारद्वाज, जमदग्नि, अगस्त्य, गर्ग, विश्वकर्मा, शांडिल्य, रौक्षायण, कपि, वाल्मीकि, दधीचि, कवास इलूसू, वत्स, काकसिवत, वेद व्यास आदि ऋषियों के वंश चले, जो आगे चलकर भिन्न-भिन्न उपजातियों में विभक्त होते गए। आचार्य महाब्राह्मण जाति की उत्पत्ति के अनेक सिद्धान्त समय-समय पर इतिहासकारों द्वारा प्रतिपादित किये हैं. परन्तु कोई भी एक अकेला सिद्धांत इस जाति की उत्पत्ति को पूर्ण रूप से समझाने में असफल है. आचार्य महाब्राह्मण जाति की उत्पत्ति के मुख्य सिद्धांत निम्नानुसार हैं:- आचार्य, गुरु, पण्डित, विद्वान, महाब्राह्मण, कट्टाह ब्राह्मण, अचारज। -मृत्युोपरांत मोक्ष प्राप्ति हेतु ग्यारहवें की क्रिया-कर्म हवन-यज्ञ तथा पिण्डदान कराने वाली एक विशेष ब्राह्मण जाति या इस जाति का व्यक्ति । -इनको महा-ब्राह्मण या आचारज भी कहते हैं । ये अपनी परंपरा गर्ग ऋषि से लगाते हैं और बयान करते हैं कि जब राजा दशरथजी की मृत्यु हुई थी तो उनके आत्मा के मोक्ष के लिए ग्यारहवें दिन की क्रिया-कर्म व यज्ञ-हवन गर्ग ऋषि गर्ग वंश :बहुत से लोगों का गोत्र गर्ग है और बहुत से लोगों का उपनाम गर्ग है। सभी का संबंध गर्ग ऋषि से है। वैदिक ऋषि गर्ग आंगिरस और भारद्वाज के वंशज 33 मंत्रकारों में श्रेष्ठ थे। गर्गवंशी लोग ब्राह्मणों और वैश्यों (बनिये) दोनों में मिल जाएंगे महाराज दशरथजी का अंतिम किर्याकांड इन्ही गर्ग ऋषी ने करवाया था। +एक गर्ग ऋषि महाभारत काल में भी हुए थे, जो यदुओं के आचार्य थे जिन्होंने 'गर्ग संहिता' लिखी+ ने कराया और 5 ग्रास खीर, रोटी और चावल वगैरा के खाये थे। इस प्रकार पहली 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की दीक्षा एवं ज्ञान प्राप्त किया। -आचार्य, गुरु, पण्डित, विद्वान, महाब्राह्मण। -कालांतर में यह जाति उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश, पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, उत्तराखण्ड एवं बिहार में निवास करती हैं। इसमें कई गोत्र हो गये हैं । इनकी अब कई खांपें पाई जाती हैं- 1. शांडिल्य, 2. कश्यप, 3. भारद्वाज, 4. सिनावड़, 5. बांवलिया,(मुंदगल)की शाखा 6. बागड़ी, 7. डलीवाल, 8. सारस्वत, 9. मामाणिया, 10. जोशी, 11. दायमा, 12. रावखड़, 13. वष्षीठ 14. आलावत, 15 डुसरीया 16 पिपलोदीया 17 राय बागडी 18 खार बागडी 19 डोलीया 20 डोलीया (पीपलोदीया)की शाखा 21 इन्दोरीया 22 ढाचोलिया 23 भुतडा 24 सान्डले( नागोरी)उपनाम 25 बेबरवाल 26श्री राम (गालरीया)की शाखा 27 गालरीया 28 पालीवाल 29 पलानिया 30 खंडेलवाल 31 सणावढ 32 तलपणिया 33 जोशी 34 राजगुरुया 35 दिल्लीवाल 36 तोषावड 37 बबेरवाल 38 पराणिया 39 मंडेलवाल 40 काटवी 41 गढगेसर 42 जाजपुरीया 43 सिवसक्त 44 मुदगल 45 सीखवाल 46 बागोरीया 47 संकवाल 48 पांडे 49 तिवारी 50 सुलानका 51 मिश्रा 52 पारासर 53 दुब्बे 54 चोबे 55 पाठक 56 बीलवाल 57 गोतम 58 सारसुद 59 बनावत 60 कोटल्य 61 वत्स 62 झा 63 कात्यान 64 गोड (अत्री) 65कोशीक वर्तमान जेसे जेसे वंश बढोतरी होती गइ ओर इन गोत्रो मे उप गोत्र भी जुडने के कारण सामील हे क्योकी असल गोत्र 42 ही थी लेकीन बाद मे 23गोत्र उपनाम की ओर जुडने से कुल 65गोत्र हुइ मेने केवल गोत्रो का संगलन्न किया हे बाकी जाती इतिहास लेख से जानकारी करके आप लोगो तक पहुचाया हे गोत्र संगलन्न कर्ता ज्वालाप्रसाद सिणगारा ये शिव धर्म को मानते हैं और महादेवजी को पूजते हैं। इनमें दारू मांस से ये परहेज करते हैं । परंतु कालांतर में यह जाति अधिक पिछङ गईं, अशिक्षा एवं गरीबी से त्रस्त इस वंश के ब्राह्मण अपने कर्म ज्ञान से विमुख हो गये, और अपना ज्ञानवर्धन की जगह मृत्युोपरांत अधिक दान प्राप्ति के लालच में अपने कर्म से गिर कर अपने वंश की मर्यादा भूल गए और कुछ निर्लज्ज लोग अशुद्ध दान ग्रहण करने लगे। तथा अपने मूल कर्म से गिर गये। इस प्रकार गिरे हुए कृत्यों तथा अशुद्ध दान से अन्य ब्राह्मणों ने इनका साथ छोड़ कर इन्हें निम्न स्तर के ब्राह्मण जैसा व्यवहार कर पिछङा बना दिया। कालांतर में यह जाति अपना यश,कीर्ति एवं ख्याति खोकर तथा अपनी वैदिक धर्म एवं कर्म से विमुख अंधकारमय जीवन जी रही हैं। परंतु पिछले दो दशकों में यह जाति अपने कर्म से ऊपर उठकर शिक्षा की ओर अग्रसर हुईं हैं। अच्छी शिक्षा और जीवन स्तर में आधुनिक एवं अभूतपूर्व परिवर्तन से यह जाति अपना यश एवं कीर्ति पुनः प्राप्ति की ओर अग्रसर है। अच्छे संस्कार और संस्कृति को अपनाकर ज्ञानवर्धन के माध्यम से अपनी धूमिल छवि को अच्छी करने में जुटे हुए हैं। दान दक्षिणा का त्याग कर स्वरोजगार करके अपने जीवन को मधुर एवं सम्मानित बना रहे हैं। उपयुक्त गोत्र जानकारी मे कोइ गोत्र को भुल वस नही लिख पाया हु तो कृपया मुझे अवगत करवाए ताकी मे भुली हुइ गोत्र को ओर एड कर सकु ओर अगली पोस्ट मे हर गोत्र की कुलदेवी व कुल देवता आदी की संप्रुण जानकारी मे आप सब के समक्ष रखुगा । 💐ज्वालाप्रसाद आचार्य सिणगारा💐

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