महापात्र ब्राह्मण उत्पत्ति= देश के आधार पे पंच गौर ब्राह्मण थे लेकिन कर्म के आधार पे 10 गौर ब्राह्मण थे=
1. गौड़ ब्राह्मण से= शर्मा महापात्र ब्राह्मण
2. सरस्वत ब्राह्मण से= आचार्या जोशी महापात्र ब्राह्मण
3. कानकुबज ब्राह्मण से= पाण्डेय तिवारी दुबे चौबे दीक्षित उपाध्याय मिश्रा महापात्र ब्राह्मण
4. मैथिल ब्राह्मण से= झा ठाकुर मिश्रा महापात्र ब्राह्मण
उत्कल ब्राह्मण से= त्रिपाठी पाठक दाश महापात्र ब्राह्मण
और जो गोत्र मूल प्रवर शाखा पंच गौर ब्राह्मण में हैं वहीं महापात्र ब्राह्मण में भी हैं
बिहार नेपाल झारखण्ड के झा ठाकुर मिश्रा महापात्र ब्राह्मण के गोत्र= शांडिल्य कश्यप वत्स भारद्वाज कौशिक पराशर मुद्गल गौतम उपमन्यु कौण्डिण्य कृष्णात्रेय स्वर्ण और भी गोत्र हैं और सभी गोत्र की अपनी कुल देवी देवता हैं और अलग अलग मूल हैं जैसे मेरा गोत्र= शांडिल्य हैं मूल=दिग्वैत् संदेपुर
ये मूल सिस्टम नॉर्थ बिहार और नेपाल के मधेश राज्य पे राजा हरिदेव सिंग का राज था उन्होने ब्राह्मण और कायस्थ को बाक़ी जातियों में शादी करने से बचाने के लिए लागू करा था तब मैथिल और महापात्र दोनों एक ही ब्राह्मण थे लेकिन जब मुगलों का आक्रमण हुआ कर्णाट राज्य पे तब आधे ब्राह्मण ने मुगलों का साथ दिया और आधे ने कर्णाट राजाओं का फ़िर कर्णाट कायस्थ राजा हार गए फ़िर पूरे नॉर्थ बिहार पे मुगलों का शासन लागू हुआ और मुगलों ने बहुत ज़्यादा अत्याचार किया जो ब्राह्मण ने मुगलों का साथ दिया था उनको मुगलों ने धन और ज़मीन देकर अमीर बना दिया और जिसने मुगलों के विरोध जाकर कायस्थ राजाओं का साथ दिया उसे हर तरह से बहिष्कृत कराया गया कर्णाट राजाओं का साथ दिया था इसीलिए नाम हो गया कर्णाट ब्राह्मण जब महेश ठाकुर नॉर्थ बिहार के राजा बने तब महेश ठाकुर कर्णाट ब्राह्मणों को बोले श्राद्ध कराने के लिए लेकिन कर्णाट ब्राह्मणों ने बोला हम दान दे सकते ले नहीं सकते फ़िर महेश ठाकुर बोले श्राद्ध का दान लो या तिरहुत छोड़ कर चले जाओ तब कुछ कर्णाट ब्राह्मण तिरहुत छोड़ कर कहीं चले गए और जो यहां रहे वो सब बहुत ग़रीब थे इसलिए दान लेना स्वीकार कर लिया फ़िर बाद में नाम हो गया महापात्र ब्राह्मण और धीरे धीरे मैथिल ब्राह्मण को लगा ये महापात्र हमसे अलग है इसलिए मैथिलो ने कर्णाट और महापात्र ना बोल कर kantaha ब्राह्मण जैसे शब्द से प्रचारित किया जब बिहार में मंडल कमिशन लागू हुआ जिसमें ग़रीब पिछड़े स्वर्ण को आरक्षण दिया गया तब लोग जो सुनते थे kantah ब्राह्मण जाति बना कर आरक्षण दिया फ़िर धीरे धीरे सभी अपनी जाति का पहचान ख़त्म करके ब्राह्मण जाति में ही गिनती कराने लगे लेकिन जो भेद भाव मुग़ल काल से था वहीं भेद भाव अभी भी हो रहा हैं इश भेद भाव को मैथिल ब्राह्मण कानक़ुबज ब्राहमण भूमिहार राजपूत चारों बढ़ावा देते हैं जबकि कानकुबज राजपूत भूमिहार इश भेद भाव का असली इतिहास जानते ही नहीं हैं 🙏
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